माँ
“ध्यान से देखो, यहाँ उपस्थित कण-कण में तुम्हारी माँ विराजमान है, चंद्रगुप्त। दृष्टि उठा कर देखो, दृष्टि बदल कर देखो चंद्रगुप्त—यहाँ सब जगह तुम्हारी माँ है। वह पर्वत, वह पर्वत उसका मस्तक है; यह दूर-दूर तक जाती धरा उसका शरीर है; और यह विशाल आकाश उसका आँचल है। चंद्रगुप्त, केवल हमें गर्भ से जन्म देने वाली ही हमारी माँ नहीं होती, हमारी मातृभूमि भी हमारी माँ होती है। इसकी हवा में हम साँस लेते हैं, जो हमारी रक्त कोशिकाओं में रक्त के साथ बहती है—यही है तुम्हारी वास्तविक माँ, चंद्रगुप्त—तुम्हारी मातृभूमि।”