Sant Vaani.
“संत वाणी वही है जो भीतर की धूल नहीं, भीतर की दिशा बदल दे;
जहाँ शब्द प्रवचन नहीं रहते, बल्कि जीवन का दर्पण बन जाते हैं।”
Sant Vaani.
“संत वाणी वही है जो भीतर की धूल नहीं, भीतर की दिशा बदल दे;
जहाँ शब्द प्रवचन नहीं रहते, बल्कि जीवन का दर्पण बन जाते हैं।”
मन के बहुतक रंग हैं, छिन-छिन बदले सोय ।
एक रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय ।।
मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक ।
जो मन पर असवार है, सो साधु कोय एक ।।
सतगुरु के उपदेश का, सुनिया एक विचार।
जो सतगुरु मिलते नहीं, जाता जम के द्वार।।
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास।
ऊपर ही ते गिरि पड़ा, मन माया के पास॥
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधे जात जंजीर।।
सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम।
निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम॥
वैद्य मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥
वृक्ष बोला पात से, सुन पत्ते मेरी बात ।
इस घर की ये रीति है, एक आवत एक जात ।।
मांस मांस सब एक हैं, मुरगी हिरनी गाय।
आंखि देखि नर खात है, ते नर नरकहि जाय।।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।
अपना तो कोई नहीं, देखी ठोकी बजाय।
अपना अपना क्या करि मोह भरम लपटायी।
राम नाम कड़वा लगे मीठै लागे दाम।
दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम।।
रचनहार को चीन्हि ले, खाने को क्या रोय ।
मन मंदिर में पैठि के, तान पिछोरी सोय ।।
तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए ।
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए ।।
गुरु को मानुष जानते, ते नार कहिए अन्ध।
होय दुखी संसार मे, आगे जम की फन्द।।
मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीति।
कहै कबीर गुरु पाइए, मन ही की परतीति॥
कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिले, साकट संग न जाय।।
आस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल।
मंझ महल से ले चला, ऐसा परबल काल।।
सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥
एक दिन ऐसों होयेगो,कोई काहू का नाही।
घर की नारी क्या कहे,तन की नारी जाही।।
प्रेम बिना नहिं भेष कछु, नाहक करै सुवाद।
प्रेम भाव जग लग नहीं, सबै भेष बरबाद।।
हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी, केस जलै ज्यूँ घास।
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥
हाड जले लकड़ी जले, जले जलावन हार।
कौतिकहारा भी जले, कासों करूं पुकार॥
चले गये सो ना मिले, किसको पूछूँ जात।
मात-पिता-सुत बान्धवा, झूठा सब संघात॥
आतम अनुभव जब भयो, तब नहि हर्ष विषाद।
चित्रा दीप सम ह्वै रहै, तजि करि बाद विवाद॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय।।
कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।
जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ।
खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ॥
झूठा सब संसार है,कोउ ना अपना मीत।
राम नाम को जानि ले,चलै सो भवजल जीत॥
विषय वासना उलझकर जन्म गंवाया बात
अब पछतावा क्या करे, निज करणी कर याद ॥
जाको राखे साइयां, मार सके न कोय।
बाल न बांका करि सके, जो जग बैरी होय।।
चाकी चाकी सब कहें, कीली कहे न कोय।
जो कीली से लाग रहे, वाको बाल न बांका होय॥
मोटी माया सब तजैं, झीनी तजी न जाय।
पीर, पैगंबर, औलिया, झीनी सबको खाय॥
पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।
कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माहिं ॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं ॥
प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥
माया दोय प्रकार की, जो कोय जानै खाय।
एक मिलावै राम को, एक नरक ले जाय॥
माया छोड़न सब कहै, माया छोरि न जाय ।
छोरन की जो बात करु, बहुत तमाचा खाय॥
आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गई खेत॥