जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे...
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
- विनोद कुमार शुक्ल
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था...
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
- विनोद कुमार शुक्ल
फूल को प्यार करो...
फूल को प्यार करो
पर झरे तो झर जाने दो,
जीवन का रस लो
देह-मन-आत्मा की रसना से
पर जो मरे
उसे मर जाने दो।
जरा है भुजा तितीर्षा की
मत बनो बाधा-
जिजीविषु को
तर जाने दो।
आसक्ति नहीं,
आनन्द है
सम्पूर्ण व्यक्ति की
अभिव्यक्ति,
मरूँ मैं, किन्तु मुझे
घोषित यह कर जाने दो।
~ अज्ञेय
युद्ध नहीं जिनके जीवन में...
युद्ध नहीं जिनके जीवन में,
वे भी बड़े अभागे होंगे।
या तो प्रण को तोड़ा होगा,
या तो रण से भागे होंगे॥
दीपक का कुछ अर्थ नहीं है,
जब तक तम से नहीं लड़ेगा।
दिनकर नहीं प्रभा बाँटेगा,
जब तक नहीं स्वयं धधकेगा॥
कभी दहकती ज्वाला के बिन,
कुंदन भला बना है सोना।
बिना घिसे मेहंदी ने बोलो,
कब पाया है रंग सलौना॥
जीवन के पथ के राही को,
क्षण भर भी विश्राम नहीं है।
कौन भला स्वीकार करेगा,
जीवन एक संग्राम नहीं है॥
अपना अपना युद्ध सभी को,
हर युग में लड़ना पड़ता है।
और समय के शिलालेख पर,
खुद को खुद गढ़ना पड़ता है॥
सच की खातिर हरिश्चंद्र को,
सकुटुम्ब बिक जाना पड़ता।
और स्वयं काशी में जाकर,
अपना मोल लगाना पड़ता॥
दासी बनकरके भरती है,
पानी पटरानी पनघट में।
और खड़ा सम्राट वचन के,
कारण काशी के मरघट में॥
ये अनवरत लड़ा जाता है,
होता युद्ध विराम नहीं है।
कौन भला स्वीकार करेगा,
जीवन एक संग्राम नहीं है॥
हर रिश्ते की कुछ कीमत है,
जिसका मोल चुकाना पड़ता।
और प्राण पण से जीवन का,
हर अनुबंध निभाना पड़ता॥
सच ने मार्ग त्याग का देखा,
झूठ रहा सुख का अभिलाषी।
दशरथ मिटे वचन की खातिर,
राम जिये होकर वनवासी॥
पावक पथ से गुजरीं सीता,
रही समय की ऐसी इच्छा।
देनी पड़ी नियति के कारण,
सीता को भी अग्नि परीक्षा॥
वन को गईं पुनः वैदेही,
निरपराध ही सुनो अकारण।
जीतीं रहीं उम्रभर बनकर,
त्याग और संघर्ष उदाहरण॥
लिए गर्भ में निज पुत्रों को,
वन का कष्ट स्वयं ही झेला।
खुद के बल पर लड़ा सिया ने,
जीवन का संग्राम अकेला॥
धनुष तोड़ कर जो लाए थे,
अब वो संग में राम नहीं है।
कौन भला स्वीकार करेगा,
जीवन एक संग्राम नहीं है॥
- कवि अर्जुन सिसोदिया
हम दीवानों की क्या हस्ती...
हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले ।
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले ।
आए बनकर उल्लास कभी, आंसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे, तुम कैसे आए, कहाँ चले ।
किस ओर चले? मत ये पूछो, बस, चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले ।
दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हंसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख-दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले ।
हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर, ले असफलता का भार चले ।
हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले ।
हम भला-बुरा सब भूल चुके, नतमस्तक हो मुख मोड़ चले
अभिशाप उठाकर होठों पर, वरदान दृगों से छोड़ चले ।
अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बन्धे थे और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले ।
देव अब छोड़ दो मुझको...
कब तक घिसटूँ
ढ़ोते हुए
अपने मस्तक पर
बोझ तुम्हारे पाँवों का
(तुम्हारे चरण तो मेरा उद्धार करने वाले थे, है न?)
तुमने मुझे सहारा दिया,
पर मेरे पाँव काट कर
तुमने मुझे शब्द दिए
पर उनके अर्थ छीन कर
तुमने मुझे रास्ता दिखाया
पर उस रास्ते में कांटे भी
तुम्हारे ही बिछाए हुए थे ।
शरीर तो दिया तुमने
पर मन के आत्मा से
मिलन के मार्ग में
मैं जान गया हूँ हे देव
स्वयं तुम ही बाधा थे ।
क्षोभ देव
तुम इतने ! अच्छे हुए
कि अब
तुम्हारी वो सारी अच्छाइयाँ
तुम्हारे किसी मेरे-जैसे चेहरे
के ऊपर के नकाब मालूम होती हैं ।
सारे गुण स्वयं में ही समेट लिए
कुछ छोड़े होते
तो आज तुम मुझे यूँ अजनबी न लगते ।
जाओ देवों जाओ
अपनी अलग दुनिया बसाओ
तुम पास रहते हो
तो तुम्हारी ऊँचाई
मुझे मेरी नज़र में बहुत नीचा बना देती है
और मैं ग्लानि में जीवन नहीं काटना चाहता।
मैं ठीक हूँ जैसा हूँ
मेरी अपनी दुनिया है सपने हैं
तुम मेरे सपनों के बीच क्यों घुसे आते हो ?
मैं तुम्हारे समीप आने के लिए ऊपर क्यों उठूँ ?
क्यों और छोटा अनुभव करूँ ?
तुम मेरे समीप आने के लिए नीचे नहीं गिर सकते?
पर तुम नहीं गिरोगे, तुम देव हो,
और मैं भी इसलिए नहीं उठूँगा, मैं मानव हूँ
अतः चलते बनो
और जा कर लौटा दो मुझे मेरी आवाज़
काफी दिनों से तुम्हारे यहाँ बंधक पड़ी है ।
~ प्रशान्त (१०.१०.९७, दशहरा)
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा...
तू चाहे चंचलता कह ले,
तू चाहे दुर्बलता कह ले,
दिल ने ज्यों ही मजबूर किया, मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा।
यह प्यार दिए का तेल नहीं,
दो चार घड़ी का खेल नहीं,
यह तो कृपाण की धारा है,
कोई गुड़ियों का खेल नहीं।
तू चाहे नादानी कह ले,
तू चाहे मनमानी कह ले,
मैंने जो भी रेखा खींची, तेरी तस्वीर बना बैठा।
मैं चातक हूँ तू बादल है,
मैं लोचन हूँ तू काजल है,
मैं आँसू हूँ तू आँचल है,
मैं प्यासा तू गंगाजल है।
तू चाहे दीवाना कह ले,
या अल्हड़ मस्ताना कह ले,
जिसने मेरा परिचय पूछा, मैं तेरा नाम बता बैठा।
सारा मदिरालय घूम गया,
प्याले प्याले को चूम गया,
पर जब तूने घूँघट खोला,
मैं बिना पिए ही झूम गया।
तू चाहे पागलपन कह ले,
तू चाहे तो पूजन कह ले,
मंदिर के जब भी द्वार खुले, मैं तेरी अलख जगा बैठा।
मैं प्यासा घट पनघट का हूँ,
जीवन भर दर दर भटका हूँ,
कुछ की बाहों में अटका हूँ,
कुछ की आँखों में खटका हूँ।
तू चाहे पछतावा कह ले,
या मन का बहलावा कह ले,
दुनिया ने जो भी दर्द दिया, मैं तेरा गीत बना बैठा।
मैं अब तक जान न पाया हूँ,
क्यों तुझसे मिलने आया हूँ,
तू मेरे दिल की धड़कन में,
मैं तेरे दर्पण की छाया हूँ।
तू चाहे तो सपना कह ले,
या अनहोनी घटना कह ले,
मैं जिस पथ पर भी चल निकला, तेरे ही दर पर जा बैठा।
मैं उर की पीड़ा सह न सकूँ,
कुछ कहना चाहूँ, कह न सकूँ,
ज्वाला बनकर भी रह न सकूँ,
आँसू बनकर भी बह न सकूँ।
तू चाहे तो रोगी कह ले,
या मतवाला जोगी कह ले,
मैं तुझे याद करते-करते अपना भी होश भुला बैठा।
~उदयभानु 'हंस'
(for acharya prashant)
गीत नया गाता हूं।
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं।
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी
अंतर को चीर
व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।
—अटल बिहारी वाजपेयी
क्या ईश्वर प्याज़ खाता है?
क्या ईश्वर प्याज़ खाता है?
एक दिन माँ ने मुझसे पूछा
जब मैं लंच से पहले
प्याज़ के छिलके उतार रहा था
क्यों नहीं माँ मैंने कहा
जब दुनिया उसने बनाई
तो गाजर मूली प्याज़ चुकन्दर-
सब उसी ने बनाया होगा
फिर वह खा क्यों नहीं सकता प्याज़?
वो बात नहीं-
हिन्दू प्याज़ नहीं खाता
धीरे-से कहती है वह
तो क्या ईश्वर हिन्दू हैं माँ?
हँसते हुए पूछता हूँ मैं
माँ अवाक देखती है मुझे
उधर छिल चुकने के बाद
अब पृथ्वी जैसा गोल कत्थई प्याज़
मेरी हथेली पर था
और ईश्वर कहीं और हो या न हो
उन आँखों में उस समय ज़रूर कहीं था
मेरे छोटे-से प्याज़ में
अपना वजूद खोजता हुआ
~ केदारनाथ सिंह
गीत नया गाता हूं।
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं।
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी
अंतर को चीर
व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।
—अटल बिहारी वाजपेयी
वरदान माँगूँगा नहीं।
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खण्डहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की सम्पत्ति चाहूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्त्तव्य पथ से किन्तु भागूँगा नहीं ।
वरदान माँगूँगा नहीं ।।
~शिव मंगल सिंह सुमन